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Ramashram Satsang, Mathura

22nd April 2018 Shanka Samadhan

मनजीत सिंह
प्रश्न (१) : नमस्कार, पूछना चाह रहे थे, हमारे शरीर की तरफ से प्रॉब्लम रहती है, सर्।


श्री संजीव भैया जी : हम सब लोग गुरु महाराज से प्रार्थना कर लेंगे। जब भी हम लोग साधना में या ईश्वर की तरफ बढ़ते हैं तो माया कुछ न कुछ ज़ोर लगाती है कि इस तरफ हमारा रुझान न हो। बाधाएं तो सामने आती ही हैं, कभी शारीरिक कभी मानसिक और भी दूसरे तरह की प्रोब्लेम्स आती हैं। गुरु महाराज से यही प्रार्थना है कि हम सबको इतनी शक्ति दें कि हम अपने जिस प्रयास में लगे हुए हैं, गुरु महाराज के बताये हुए रास्ते पर लगे हुए हैं, उसमें लगे रहें।

सियाराम जी, गोरखपुर से
प्रश्न (२) : भैया जी, हम ये जानना चाह रहे हैं कि हम 4 बरस से रामाश्रम सत्संग से जुड़े हुए हैं, तो गुरु महाराज जो थे वो तो है नहीं। तो अब हम किसको गुरु बनाए? हम गुरु बनाना चाहते हैं तो किसको मानेंगे ?


श्री संजीव भैया जी : ये प्रश्न यहां अक्सर आया करता है। असल में, हर जगह क्या होता है कि यह हमको बतला दिया जाता है। इस सत्संग में गुरु महाराज ने तो हमेशा ये कहा कि जो भी आया हम उसको दादा गुरु महाराज को संभला देते हैं। गुरु महाराज ने जैसे खुद भी लिखा है और हमने पढ़ा भी है कि और जगह तो सुनते हैं कि पारस लोहा को सोना बनाता है हमारे यहां पारस से पारस बनता है। तो गुरु महाराज के बाद पंडित जी महाराज, परम पूज्य जिया मां, परम पूज्य बड़े भैया, तीनो लोग जो किसी एक के पास साधक गया उसे दूसरे के पास भेज दिया। और मैंने तो अपने जीवन में यही सुना कि उनमें से किसी से भी अगर साधक का प्रेम हो गया तो उन्होंने उसको आगे बढ़ा दिया। तो अब प्रश्न ये हो जाता है कि अब इनमें से कौन गुरु गद्दी पर है? कौन गुरु है? हमारे यहाँ एक ऐसी स्थिति यह आ गयी है, जो कि बड़ी अलौकिक सी है कि ये आपको बताया नही जाता। गुरु महाराज ने लिखा है कि ‘गुरु मिला तब जानिए, जब मिटे मोह संताप’। जिसका जहां रुझान हो गया वहीं से आगे बढ़ा दिया गया। क्योंकि जिन सबका मैंने नाम लिया और आज भी, वो अपने गुरु को, फिर गुरु महाराज को , और गुरु महाराज दादा गुरु महाराज को। इस तरह से सिलसिला तो हमें वहीं पहुँचाएगा। अब हम कहाँ से जुड़ते है, उसके लिए गुरु महाराज ने एक किताब भी लिखी। संत सहजोबाई मे उन्होंने बताया कि गुरु को कैसे ढ़ुढ़ना चाहिए। गुरु कैसे पता लगे कि कौन हैं।

प्रश्नकर्ता – भैयाजी, एक प्रश्न मेरा और है। हम लोग पूरा परिवार सर nonveg खाते है, तो अभी हमलोग से नॉनवेज छूट नहीं रहा है, उसके लिए क्या कुछ विशेष… ?
श्री संजीव भैया जी: देखिये बात ऐसी है कि अगर ज़ोर-ज़बरदस्ती की जाए तो वो काम अगर होगा भी तो ठीक नही होगा। गुरु महाराज ने खुद भी कभी किसी के लिए ये नियम लागू नही किया कि ऐसा ही होना चाहिए। उन्होंने दो तीन तरीके ज़रूर बताए हैं। एक तो उन्होंने ये कहा कि जिसका इस तरफ रुझान करना हो जिसकी वृत्तियाँ थोड़ी सुधारनी हो, उसको जब खुद सत्संग में ध्यान में बैठो तो अपने पास बिठा लो और ये देखो कि जो प्रकाश हमारे ऊपर आ रहा है वही उनके ऊपर भी आ रहा है। ऐसा करने से फर्क होता है।

दूसरी चीज क्या है कि हमारा काम यहां पर ऐसा है कि गुरु दरबार में आकर गुरु जैसे बनना है। पंडित जी महाराज ये कहा करते थे कि गुरु से मिलना एक बात है और गुरु में मिलना दूसरी बात है तो हमे गुरु में मिलना है, हमे उनके जैसा बनना है। तो जैसे जैसे हम उनके जैसे बनते जाएंगे तो उनके पास जो भी आया उसका जीवन बदल गया। तो ऐसे ही हमारे साथ भी होना चाहिए कि हम किसी से कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नही करें। जो हमारे आसपास है उसमें अपने आप परिस्थितियाँ जो है वो सात्विक होती चली जाएंगी। तो इसमें दोनो ही बातें है कि एक तो अपनी प्रार्थना का फल उन्हें दें, दूसरी बात ये है कि अपने को इतना सात्विक बनाए की उसका असर दूसरों पर होने लग जाए। और कुछ करने की जरूरत नही है।

महेंद्र जी, जयपुर से
प्रश्न (३) भैयाजी, एक प्रश्न काफी दिनों से मेरे माइंड (mind) मे चल रहा है कि मैं regular ध्यान तो नही करता लेकिन चिंतन तो हमेशा कई बार आप बताते है भंडारों मैं या सत्संग में, चिन्तन तो मैं रेगुलरली (regularly) करता हुं। पर ध्यान regular नही कर पाता हूँ मैं। तो बेनिफिट (benefit) क्या उसमें होगा ? चिंतन करता रहूँ हर पल वो ठीक रहेगा या ध्यान जरूरी है ?


श्री संजीव भैया जी : परम पूज्य पापाजी ने, परम पूज्य छोटे भैया ने तो चिंतन पर बहुत ज़ोर दिया है और हमारे यहां अक्सर यह कहा गया है। वैसे तो ध्यान की जो बात बतलाई गयी है उसका अपना फायदा है मगर चिंतन उसी का एक दूसरा स्वरूप है। जैसे हम पान खाते हैं तो पान का खाना अपना चलता रहता है और जो काम करने होते हैं वो करते रहते हैं। तो ध्यान तो उसी टाइम हो सकता है पर चिंतन ज्यादा टाइम हो सकता है. असल में दोनों जगह हम गुरु से अपनी सुरति की धार मिला रहे हैं। यही हमें करना है तो असर दोनो का एक ही है। बल्कि मैं तो ये समझता हूँ कि ध्यान करते करते साधक की एक ऐसी स्थिति हो जाती है कि वो हर समय चिंतन करने लायक हो जाता है। अगर हम already चिंतन कर सकते हैं, सुरति की धार उस तरफ लगा सकते हैं तो ये तो बहुत अच्छी बात है।

संजय, बलिया से
प्रश्न (४) हम ध्यान के लिए फोन किये हैं. जी फ़ोन करते है बात करते है ध्यान इधर उधर हट जाता है। ध्यान के लिए हमको आशीर्वाद दे दीजिए, हमारा ध्यान जो है गुरूजी के चरणों में लगा रहे।


श्री संजीव भैया जी का उत्तर : हाँ, अक्सर साधकों पर यह स्थिति आती है, जब या तो ध्यान नहीं लगता है या ध्यान में जाते ही थोड़ी देर में मन इधर उधर होने लगता है। हमें कर्तव्य बुद्धि के साथ ध्यान में बैठ जाना है। इसमें अलग अलग स्थितियाँ आती है। रज, तम और सत् के प्रभाव में हमारा मन इधर उधर जाता है, तो हमें उससे कुश्ती नहीं लड़नी है। कोशिश यही करनी चाहिए कि हम द्रष्टा भाव से उसको देखते रहें तो धीरे धीरे मन लग जाता है।

प्रश्नकर्ता: बुरा से बुरा काम दिखाए देता है गुरु जी

श्री संजीव भैया जी : हाँ, उससे कुश्ती नहीं लड़ें। अपने मन से कुश्ती नही लड़ें। जब भी हम मन से कुश्ती लड़ते हैं तो हम कर्ता बन जाते हैं। हमारी साधना द्रष्टा साधना है और मन जो चलायमान है, तो उसको देखते रहें उससे कुश्ती न लड़ें और धीरे धीरे अपने आप मन थोड़ा कस जाएगा। अपना प्रयास जारी रखें और गुरु महाराज से प्रार्थना करते रहें।

प्रश्नकर्ता – एक और प्रश्न है, गुरु जी, हम बहुत ग़रीब परिवार से आते हैं। अपनी लड़की की शादी के लिये वर भी ढूंढ दिया हूँ । गुरु जी, आशीर्वाद भी दे दीजिए कि शादी अच्छे से पुर्ण हो जाये। यही आशीर्वाद के लिए मैं प्रार्थना कर रहा हूँ ।

श्री संजीव भैया जी : हम सब लोग गुरु महाराज से प्रार्थना करें कि जो भी विघ्न है सब दूर हो। गुरु महाराज की कृपा से सब ठीक हो , हम सब यही प्रार्थना करते हैं।

पूजा, भुज से
प्रश्न (५) : भैया, मेरा प्रश्न ये है कि कभी कभी बहुत निगेटिविटी (negativity) आती है। कोई गलत ख्याल पकड़ लेता है तो लगता है कि छूट ही नही रहा है। वही चीज सारा दिन दिमाग में, चाहे ध्यान में बैठे है तो भी वही ख्याल आता है। तो अगर ऐसी स्थिति हो तो क्या करना चाहिए?


श्री संजीव भैया जी : अभी पिछले हफ्ते आध्यात्मिक विषय मीमांसा से कुछ पढ़ रहा था. उसमें गुरु महाराज ने कहा है कि दो शक्तियां हैं, एक निगेटिव (negative) और एक पॉजिटिव (positive)। पॉजिटिव ऊपर उठाती है, निगेटिव नीचे गिराती है और संसार की तरफ ले जाती है। तो ये निगेटिव पावर जो है वो हम सब केे पीछे पड़ी रहती है क्योंकि ये natural है. संसार में रहेंगे तो negativity तो बढ़ेगी ही। तो उसमें एक चीज तो गुरु महाराज ने ये कहा कि हम जिन लोगों का संग करते है उसका संग का असर जो है वो ऐसा होता है कि वो negativity बढ़iता है।

इधर उधर की बातें सोचने की बजाय अगर थोड़ा सा सत् की तरफ यानी गुरु, ईश्वर की तरफ अपनी सुरति की धार लगाएंगे, उनसे शक्ति खींचेंगे तो हमारे में positivity बढ़ेगी और हमारे में ही नहीं, वो पॉजिटिविटी (positivity) हमारे आसपास का जो एनवायरनमेंट (environment) है, हमारे आसपास के जो लोग हैं घर में या बाहर, उनपर भी धीरे धीरे उसका असर होगा।

तो समाज में, घर में या अपने में पाजिटिविटी (positivity) बढ़ाने के लिए ही गुरु महाराज ने हमे ये तरीके दिये हैं। गुरु महाराज से ये प्रार्थना है कि हम सबको इस माया के चंगुल से निकालें, ये निगेटिविटी (negativity) जो बढ़ती चली जा रही है आजकल। मैं सबसे ये सुनता हूँ किसी दिन इसको थोड़ा और elaborate भी करूँगा मगर, बात यही है कि हम किस तरफ अपना ध्यान दे रहे हैं, सुरति की धार किस तरफ लगा रहे हैं और किन लोगों से हम मिल रहे हैं। अक्सर ये होता है कि हम भंडारों में जाते हैं, सत्संग में जाते हैं, अच्छे लोगो से मिलते हैं, अच्छी बातें होती हैं तो थोड़ी पाजिटिविटी (positivity) बढ़ती है लेकिन आसपास में कुछ न कुछ ऐसे लोग होते है जो उसका असर एक सेकंड में ख़त्म कर देते हैं।

प्रश्नकर्ता – जी भैया ऐसा मैने भी महसूस किया है कि सत्संग भंडारे वगैरह में रहते हैं तो ऐसा कोई ख्याल नहीं आता पर वहां से जब चले आते हैं तो फिर से वो ही सब चीजें। बिल्कुल भैया, मैं आपकी बात को फॉलो (follow) करुंगी और कोशिश करूंगी की पॉजिटिविटी लाऊं अपने व्यवहार में। प्रणाम भैया ।

श्री संजीव भैया जी — गुरु महाराज दया करें।हम सबको ये शक्ति दें। यही हमलोगों की उनसे प्रार्थना है।

प्रश्न कर्ता – भैया एक छोटा सा शेर अर्ज करना चाहूंगी।
भैया जी – ज़रूर।

प्रश्नकर्ता –
कुछ इस अदा से आजतक वो पहलु नशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे, हम नहीं रहे।
अल्लाह ये चश्मे यार की मोअज्जिज़ बयानियाँ
हर एक को है ग़ुमान, के मुख़ातिब हम ही रहे।।

आकांक्षा, पटना से
प्रश्न (६): जब बैठते हैं ध्यान करने के लिए और जब आँख खोलते हैं तो चक्कर जैसा लगने लगता है। ऐसा क्यों है?


श्री संजीव भैया जी : अभी अगर आप सुन रहे थे तो ध्यान और चिंतन की बात हो रही थी। तो ध्यान थोड़ा concentrated होता है, एकाग्रता की जरूरत होती है। थोड़ा मस्तिष्क पर ज़ोर पड़ता है। चिंतन जो है उसमें थोड़ा हल्का रहता है तो आप ध्यान थोड़ा कम करें या थोड़े दिन बंद कर दें और चिंतन की ओर थोड़ा ज्यादा ध्यान दें। जब याद करेंगे, उनकी तरफ अपनी सुरति की धार, तवज़्ज़ह उनकी तरफ करेंगे तो वही शक्ति आएगी। वही काम चलता रहेगा। तो चिंतन करें।

राजो ठाकुर
प्रश्न (७) : मैं ये कह रहा हूँ कि जब भी मैं पूजा पर बैठता हूँ तो टुंडला वाले बाबूजी का मैं ध्यान करता हूँ, बचपन से ही टुंडला वाले बाबूजी का मैं ध्यान करते आया हूँ, और क्रिया हमे बताई जाती है कि आपके सामने परमात्मा है उनके हृदय से प्रकाश आता है अपने हृदय में भरना है। तो मैं तो उन्ही को देखता हूं सामने। तो मैं सही करता हूँ या गलत करता हूँ?

श्री संजीव भैया जी : हमलोग गुरु को शरीर या मनुष्य अगर मान लें तो वो भी उतना ही है। क्योंकि गुरु और ईश्वर में कोई फर्क नही बतलाया है गुरु महाराज ने। असल चीज जो है वहां तक पहुंचने के लिए, हमें स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण की तरफ बढ़ना होगा। हम अगर स्थूल में ही अटक गए तो वो ठीक नहीं होगा। यहां पर प्रकाश स्वरूप हमें देखना है। और जैसे ईश्वर को समझना मुश्किल है वैसे ही गुरु को समझना भी उतना ही मुश्किल है। तो प्रकाश रूप में देख कर और उस प्रकाश को अपने अंतर में भर कर उन्ही के स्वरूप में आना है। बाकी गुरु महाराज दया करेंगे। उनकी कृपा से हम सब लोग अपने ध्येय की तरफ बढ़ते रहें, यही उनसे प्रार्थना है।

दौलत सिंह, नारंगपुर से
प्रश्न (८): हमारी दुकान है, दुकान नही चलती बहुत दिन से, बहुत परेशान हूँ। 25 – 30 साल हो गए। चार बच्चे हैं, और कुछ नही है हमारे पास। बहुत परेशान हूँ । किराए पर रहते है मकान तक नहीं, कुछ भी नहीं। दुकान चलती नहीं, दुकान कर रखी है रेडीमेड की, बहुत ही परेशान हूँ।

श्री संजीव भैया जी : अपना प्रयास करते रहें। गुरु महाराज से प्रार्थना है कि जो कष्ट और परेशानियां आ रही हैं उनको हटाएँ और आपको शक्ति दें। अपने प्रयास में लगे रहें। हमारा काम तो प्रयास करना है और गुरु महाराज के हाथ में ही फल है। उनसे यही प्रार्थना है कि समृद्धि दें और शक्ति दें। जब भी हम साधना में लगते हैं तो माया के थपेड़े ज़रूर सामने आते हैं और परेशानियां अक्सर सामने आया करतीं हैं। ऐसे में गुरु महाराज से प्रार्थना कर लेना ही हमारा साधन है।

जब भी हम गुरु महाराज का विचार करते हैं तो हमें ये निश्चय समझना चाहिए कि वो हमको देख रहे हैं। यही परम पूज्य पंडित जी महाराज ने लिखा था। उनकी कृपा हमेशा आप पर बनी रहे, हम सब पर बनी रहे, यही प्रार्थना है।

चंद्रलेखा जी
प्रश्न (९): हमारा प्रश्न यही था कि जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो गुरु जी का ध्यान करते हैं, बड़े गुरु महाराज जी का। अब कुछ सालों से ध्यान हमारा नही लगता है। हमारे अपने दिखाई पड़ने लगते हैं जो चले गए। घबरा जाते हैं। बहुत टेंशन रहता है।


श्री संजीव भैया जी : tension किस बात का रहता है?

प्रश्नकर्ता: हमारे हस्बैंड भी इक्स्पाइअर (expire) हो गाए १०-१२ साल पहले। फिर बहु भी हमारी expire हो गयी है 6 months पहले। इस वजह से हमको टेंशन रहता है

श्री संजीव भैया जी : गुरु महाराज से प्रार्थना है कि हम सबको शक्ति दें अपनी कृपा करें जिससे इन सब स्थितियों में हम उनके चरणों में लगे रहें। गुरु महाराज कृपा करें।

प्रश्नकर्ता: भैया जी, साप्ताहिक सत्संग में हमारा मन लगता है, पर घर पर नहीं लगता। घर पर हमारे father, husband, ये सब दिखाए देते हैं। वैसे गुरु महाराज का फ़ोटो रखती हुईं हमेशा अपने पास।


श्री संजीव भैया जी : गुरु महाराज ने ये लिखा है और देखा भी यही गया है कि साधना में, इसको अध्यात्म यात्रा कहा है। साधना में हमारी स्थितियां बदलती रहती हैं और वो हर समय एक सी नहीं रहतीं। जैसे सत, रज और तम का प्रभाव जो है वो अलग अलग स्थितियाँ लाता रहता है। कभी मन एकदम अशांत हो जाता है, कभी चलायमान हो जाता है। कभी एकदम वो आनंद और कभी वो सब हटा के फिर मूढ़ता आ जाती है। इस तरह की स्थितियां जो हैं वो साधना में आती ही हैं। तो गुरु महाराज ने भी यही कहा है कि सिर्फ कर्तव्य बुद्धि से हमें बैठ जाना चाहिए उनके सामने। बाकी मन जो कर रहा है उसे देखते रहें, उससे कुश्ती न लड़ें। धीरे धीरे अपने आप वो स्थिति जो है वो निकल जायेगी। कभी कभी ये स्थितियाँ ज्यादा देर रह जाती हैं, कभी कभी यूँ ही निकल जाती हैं। तो उनसे प्रार्थना यही है कि चंचलता और विफ़लता की स्थिति से स्थिरता और आनंद की स्थिति में ले जाएँ।

प्रश्नकर्ता : दूसरा प्रश्न ये था कि सुबह शाम हम टाइम से नहीं बैठ पाते हैं। सुबह हमको टाइम नही मिलता है। मतलब घर में काम की वजह से, तो जैसे दोपहर में मिलता है। पहले बच्चे स्कूल चले जाते थे तब ध्यान में बैठते थे मगर अब पोता पोती चले जाते है तब ध्यान में बैठते है। तो हमारा मन लग जाता है। तो ऐसा जरूरी है कि सुबह शाम ही बैठें ?


श्री संजीव भैया जी : नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं है। जैसे समय बतलाया जाता है प्रातः सायं, तो इसलिए कहा कि यह ज्यादा सूट करता है कि भाई दिन का काम शुरू करने से पहले और दिन का काम ख़तम करने के बाद। अगर आपको और कोई समय ठीक लगता है तो उसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है। कोशिश ये करनी चाहिए कि स्थान और समय अगर हम बांध लेते हैं, तो उस समय अपने आप स्थिति थोड़ी एकाग्र होने लगती है और मन की एकाग्रता में थोड़ी सहायता मिलती है। हमें कोशिश ये करनी चाहिए कि समय और स्थान जो है वो एक बना लें और उसी पर बैठें । मगर ऐसा कोई नहीं है कि गुरु महाराज ने कोई specific time बतलाया कि इसी टाइम पे बैठना है।

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  1. Pp bhaiya ji k charno me pranam, About 26august , shanka smadhan, my comment is …. 1.The sound is clear but volume is very low ……………
    2.sometime intrreputed that means beeping, children noising, bhajan. 3.the programme being end, before about15_20 minutes the sound is not clear and bhajan sound is interrupt.

22nd April 2018 Shanka Samadhan